हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: देरी के आधार पर इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट नहीं कर सकेंगी कंपनियां
सड़क हादसों के पीड़ितों और उनके परिजनों के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला बड़ी राहत लेकर आया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल समय सीमा (लिमिटेशन) के आधार पर बीमा कंपनियां क्षतिपूर्ति देने से इनकार नहीं कर सकतीं। तकनीकी कारणों का हवाला देकर पीड़ितों को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
बीमा कंपनियों की याचिकाएं खारिज
मामले में श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी, बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, मैग्मा एचडीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और इफको टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड सहित कई कंपनियों ने 40 से अधिक सिविल रिवीजन याचिकाएं दायर की थीं।
इन याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166(3) के तहत तय समय सीमा बीत जाने के बाद ट्रिब्यूनल को क्लेम सुनने का अधिकार नहीं है।
हालांकि हाई कोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि न्याय केवल तकनीकी आधार पर नहीं रोका जा सकता।
ट्रिब्यूनल को सुनवाई जारी रखने के निर्देश
हाई कोर्ट ने मोटर दुर्घटना क्लेम ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वे ऐसे मामलों की सुनवाई कानून के अनुसार जारी रखें। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि चूंकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए अंतिम आदेश पारित करने से पहले शीर्ष अदालत के फैसले का इंतजार किया जाएगा।
पीड़ितों को बड़ी राहत
इस फैसले से उन पीड़ितों और परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी, जो देरी के कारण मुआवजे से वंचित रह जाते थे। अदालत ने साफ कर दिया है कि न्याय प्रक्रिया में तकनीकी बाधाएं पीड़ितों के अधिकारों पर हावी नहीं हो सकतीं।



