सर्विस बुक गुम हुई तो अटक गई पेंशन, 15 साल बाद हाईकोर्ट ने दिलाया न्याय
बिलासपुर सर्विस बुक गुम होने का हवाला देकर करीब 15 वर्षों तक पेंशन और सेवानिवृत्ति देयकों के लिए भटकती रहीं जशपुर की विधवा बैगीन बाई को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने राज्य शासन को कड़ी फटकार लगाते हुए मानसिक प्रताड़ना के लिए बैगीन बाई को 25 हजार रुपये क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि शासन चाहे तो क्षतिपूर्ति की राशि उन जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूल सकता है, जिनकी लापरवाही के कारण महिला को इतने लंबे समय तक परेशान होना पड़ा।
पति की मौत के बाद शुरू हुआ संघर्ष
जशपुर जिले के ग्राम पल्लीडीह निवासी बैगीन बाई के पति शंकर साई सिदार पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग में ग्रामीण सहायक के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने 11 सितंबर 2003 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दिया था।
हालांकि आवेदन पर निर्णय होने से पहले ही 4 जून 2007 को शंकर साई सिदार का निधन हो गया। इसके बाद उनकी पत्नी बैगीन बाई ने पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान के लिए लगातार विभागीय स्तर पर आवेदन किए।
लेकिन हर बार उन्हें सर्विस रिकॉर्ड या सर्विस बुक उपलब्ध नहीं होने का हवाला दिया जाता रहा।
15 साल तक नहीं मिला हक
सरकारी रिकॉर्ड की समस्या के कारण बैगीन बाई को करीब 15 वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए भटकना पड़ा। आखिरकार वर्ष 2021 में उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत के हस्तक्षेप के बाद मामले में कार्रवाई आगे बढ़ी और बैगीन बाई के बकाया सेवानिवृत्ति देयकों का भुगतान किया गया।
हाईकोर्ट ने अधिकारियों की लापरवाही पर जताई नाराजगी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि एक अनपढ़ विधवा को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए इतने लंबे समय तक परेशान होना पड़ा।
अदालत ने मानसिक प्रताड़ना के लिए 25 हजार रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। साथ ही शासन को जिम्मेदार अधिकारियों से यह राशि वसूलने की स्वतंत्रता भी दी।
हाईकोर्ट ने 27 नवंबर 2025 को आदेश जारी कर बकाया देयकों का भुगतान 60 दिनों के भीतर करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद बैगीन बाई को उनके सभी बकाया देयकों का भुगतान कर दिया गया।
रिकॉर्ड गुम होने का खामियाजा परिवार क्यों भुगते?
यह मामला सरकारी रिकॉर्ड के रखरखाव और कर्मचारियों के परिवारों के अधिकारों से जुड़ा अहम सवाल उठाता है। अदालत के फैसले से स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी रिकॉर्ड की कमी या विभागीय लापरवाही का खामियाजा किसी कर्मचारी के परिवार को वर्षों तक नहीं भुगतना चाहिए।



